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आदि पर्व
अध्याय १७८
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वैशम्पाय़न उवाच
ते क्षत्रिय़ा रङ्गगताः समेता; जिगीषमाणा द्रुपदात्मजां ताम् |  ४   क
चकाशिरे पर्वतराजकन्या; मुमां यथा देवगणाः समेताः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति