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शान्ति पर्व
अध्याय १७८
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भृगुरु उवाच
वाय़ोर्गतिमहं व्रह्मन्कीर्तय़िष्यामि तेऽनघ |  २   क
प्राणिनामनिलो देहान्यथा चेष्टय़ते वली ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति