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शान्ति पर्व
अध्याय १७८
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भृगुरु उवाच
श्रितो मूर्धानमग्निस्तु शरीरं परिपालय़न् |  ३   क
प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति