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शान्ति पर्व
अध्याय १७८
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भृगुरु उवाच
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः |  ४   क
मनो वुद्धिरहङ्कारो भूतानि विषय़ाश्च सः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति