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शान्ति पर्व
अध्याय १७८
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भृगुरु उवाच
प्रय़त्ने कर्मणि वले य एकस्त्रिषु वर्तते |  ७   क
उदान इति तं प्राहुरध्यात्मविदुषो जनाः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति