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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
तत्र वै मानुषाल्लोकाद्दानादिभिरतन्द्रितः |  १०   क
अहिंसार्थसमाय़ुक्तैः कारणैः स्वर्गमश्नुते ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति