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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
तिर्यग्योन्यां पृथग्भावो मनुष्यत्वे विधीय़ते |  १३   क
गवादिभ्यस्तथाश्वेभ्यो देवत्वमपि दृश्यते ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति