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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
जातो जातश्च वलवान्भुङ्क्ते चात्मा स देहवान् |  १५   क
फलार्थस्तात निष्पृक्तः प्रजालक्षणभावनः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति