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वन पर्व
अध्याय १७८
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युधिष्ठिर उवाच
शव्दे स्पर्शे च रूपे च तथैव रसगन्धय़ोः |  १६   क
तस्याधिष्ठानमव्यग्रं व्रूहि सर्प यथातथम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति