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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
अत्र चापि नरव्याघ्र मनो जन्तोर्विधीय़ते |  २१   क
तस्माद्युगपदस्यात्र ग्रहणं नोपपद्यते ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति