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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
वुद्धिरात्मानुगा तात उत्पातेन विधीय़ते |  २५   क
तदाश्रिता हि सञ्ज्ञैषा विधिस्तस्यैषणे भवेत् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति