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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
वुद्धेर्गुणविधिर्नास्ति मनस्तु गुणवद्भवेत् |  २६   क
वुद्धिरुत्पद्यते कार्ये मनस्तूत्पन्नमेव हि ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति