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वन पर्व
अध्याय १७८
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युधिष्ठिर उवाच
दानाद्वा सर्प सत्याद्वा किमतो गुरु दृश्यते |  ३   क
अहिंसाप्रिय़योश्चैव गुरुलाघवमुच्यताम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति