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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
सुप्रज्ञमपि चेच्छूरमृद्धिर्मोहय़ते नरम् |  ३०   क
वर्तमानः सुखे सर्वो नावैतीति मतिर्मम ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति