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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
अहं हि दिवि दिव्येन विमानेन चरन्पुरा |  ३३   क
अभिमानेन मत्तः सन्कञ्चिन्नान्यमचिन्तय़म् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति