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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
व्रह्मर्षिदेवगन्धर्वय़क्षराक्षसकिंनराः |  ३४   क
करान्मम प्रय़च्छन्ति सर्वे त्रैलोक्यवासिनः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति