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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
चक्षुषा यं प्रपश्यामि प्राणिनं पृथिवीपते |  ३५   क
तस्य तेजो हराम्याशु तद्धि दृष्टिवलं मम ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति