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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
तत्र ह्यगस्त्यः पादेन वहन्स्पृष्टो मय़ा मुनिः |  ३७   क
अदृष्टेन ततोऽस्म्युक्तो ध्वंस सर्पेति वै रुषा ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति