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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
अय़ाचं तमहं विप्रं शापस्यान्तो भवेदिति |  ३९   क
अज्ञानात्सम्प्रवृत्तस्य भगवन्क्षन्तुमर्हसि ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति