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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
अभिमानस्य घोरस्य वलस्य च नराधिप |  ४१   क
फले क्षीणे महाराज फलं पुण्यमवाप्स्यसि ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति