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शल्य पर्व
अध्याय २४
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सञ्जय़ उवाच
आहुः केचिद्धते सूते प्रय़ातो यत्र सौवलः |  ३८   क
अपरे त्वव्रुवंस्तत्र क्षत्रिय़ा भृशविक्षताः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति