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वन पर्व
अध्याय १७८
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सर्प उवाच
अरिष्ट एष ते भ्राता भीमो मुक्तो महाभुजः |  ४४   क
स्वस्ति तेऽस्तु महाराज गमिष्यामि दिवं पुनः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति