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वन पर्व
अध्याय २११
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मार्कण्डेय़ उवाच
संस्पृशेय़ुर्यदान्योन्यं कथञ्चिद्वाय़ुनाग्नय़ः |  २४   क
इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचय़ेऽग्नय़े ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति