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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
एतच्छ्रुत्वा पाण्डवो धर्मराजो; भ्रातुर्वाक्यं परुषं फल्गुनस्य |  १०१   क
उत्थाय़ तस्माच्छय़नादुवाच; पार्थं ततो दुःखपरीतचेताः ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति