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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
मित्रेणाभ्यर्थितं मित्रमर्थे संशय़िते क्वचित् |  ६९   क
वालकोट्यग्रमात्रेण स्वार्थेनाघ्नत तद्वसु ||  ६९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति