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आदि पर्व
अध्याय १२३
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वैशम्पाय़न उवाच
तमुवाच स कौन्तेय़ः पश्याम्येनं वनस्पतिम् |  ५४   क
भवन्तं च तथा भ्रातृन्भासं चेति पुनः पुनः ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति