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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
वर्णान्हृत्वा तु पुरुषो मृतो जाय़ति वर्हिणः |  १०२   क
हृत्वा रक्तानि वस्त्राणि जाय़ते जीवजीवकः ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति