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वन पर्व
अध्याय १७९
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वैशम्पाय़न उवाच
न स्म प्रज्ञाय़ते किञ्चिदम्भसा समवस्तृते |  ५   क
समं वा विषमं वापि नद्यो वा स्थावराणि वा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति