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वन पर्व
अध्याय १७९
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वैशम्पाय़न उवाच
नदतां काननान्तेषु श्रूय़न्ते विविधाः स्वनाः |  ७   क
वृष्टिभिस्ताड्यमानानां वराहमृगपक्षिणाम् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति