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आदि पर्व
अध्याय १८
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विनतो उवाच
श्वेत एवाश्वराजोऽय़ं किं वा त्वं मन्यसे शुभे |  ३   क
व्रूहि वर्णं त्वमप्यस्य ततोऽत्र विपणावहे ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति