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आदि पर्व
अध्याय १८
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सूत उवाच
आविशध्वं हय़ं क्षिप्रं दासी न स्यामहं यथा |  ७   क
तद्वाक्यं नान्वपद्यन्त ताञ्शशाप भुजङ्गमान् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति