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सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
न ववौ पवनश्चैव नाग्निर्जज्वाल चैधितः |  १०   क
व्यभ्रमच्चापि संविग्नं दिवि नक्षत्रमण्डलम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति