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सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
ततः स यज्ञं रौद्रेण विव्याध हृदि पत्रिणा |  १३   क
अपक्रान्तस्ततो यज्ञो मृगो भूत्वा सपावकः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति