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सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
स तु तेनैव रूपेण दिवं प्राप्य व्यरोचत |  १४   क
अन्वीय़मानो रुद्रेण युधिष्ठिर नभस्तले ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति