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सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
अपक्रान्ते ततो यज्ञे सञ्ज्ञा न प्रत्यभात्सुरान् |  १५   क
नष्टसञ्ज्ञेषु देवेषु न प्रज्ञाय़त किञ्चन ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति