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सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
प्राद्रवन्त ततो देवा यज्ञाङ्गानि च सर्वशः |  १७   क
केचित्तत्रैव घूर्णन्तो गतासव इवाभवन् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति