सौप्तिक पर्व  अध्याय १८

वासुदेव उवाच

ततो विधनुषं देवा देवश्रेष्ठमुपागमन् |  २०   क
शरणं सह यज्ञेन प्रसादं चाकरोत्प्रभुः ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति