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सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
तस्मिन्क्रुद्धेऽभवत्सर्वमस्वस्थं भुवनं विभो |  २४   क
प्रसन्ने च पुनः स्वस्थं स प्रसन्नोऽस्य वीर्यवान् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति