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सौप्तिक पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
लोकय़ज्ञेन यज्ञैषी कपर्दी विदधे धनुः |  ६   क
धनुः सृष्टमभूत्तस्य पञ्चकिष्कुप्रमाणतः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति