स्त्री पर्व  अध्याय १८

गान्धार्यु उवाच

सहैव सहदेवेन नकुलेनार्जुनेन च |  २२   क
दासभार्यासि पाञ्चालि क्षिप्रं प्रविश नो गृहान् ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति