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वन पर्व
अध्याय २७५
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अग्निरु उवाच
अहमन्तःशरीरस्थो भूतानां रघुनन्दन |  २७   क
सुसूक्ष्ममपि काकुत्स्थ मैथिली नापराध्यति ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति