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शान्ति पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़ं हित्वा प्रदीप्तां त्वं श्ववत्सम्प्रति वीक्ष्यसे |  १२   क
अपुत्रा जननी तेऽद्य कौसल्या चापतिस्त्वय़ा ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति