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शान्ति पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
स्रजो गन्धानलङ्कारान्वासांसि विविधानि च |  १६   क
किमर्थमभिसन्त्यज्य परिव्रजसि निष्क्रिय़ः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति