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शान्ति पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रिय़ा निराशैरधनैस्त्यक्तमित्रैरकिञ्चनैः |  २२   क
सौखिकैः सम्भृतानर्थान्यः सन्त्यजसि किं नु तत् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति