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शान्ति पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
जातवेदा यथा राजन्नादग्ध्वैवोपशाम्यति |  २५   क
सदैव याचमानो वै तथा शाम्यति न द्विजः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति