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शान्ति पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
अन्नाद्गृहस्था लोकेऽस्मिन्भिक्षवस्तत एव च |  २७   क
अन्नात्प्राणः प्रभवति अन्नदः प्राणदो भवेत् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति