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शान्ति पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
काषाय़ैरजिनैश्चीरैर्नग्नान्मुण्डाञ्जटाधरान् |  ३४   क
विभ्रत्साधून्महाराज जय़ लोकाञ्जितेन्द्रिय़ः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति