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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
असितो देवलश्चैव प्राह पाण्डुसुतं नृपम् |  १४   क
शापाच्छक्रस्य कौन्तेय़ चितो धर्मोऽनशन्मम |  १४   ख
तन्मे धर्मं यशश्चाग्र्यमाय़ुश्चैवाददद्भवः ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति