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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
वसिष्ठो नाम भगवांश्चाक्षुषस्य मनोः सुतः |  १६   क
शतक्रतोरचिन्त्यस्य सत्रे वर्षसहस्रिके |  १६   ख
वर्तमानेऽव्रवीद्वाक्यं साम्नि ह्युच्चारिते मय़ा ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति