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अनुशासन पर्व
अध्याय १८
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वैशम्पाय़न उवाच
रथन्तरं द्विजश्रेष्ठ न सम्यगिति वर्तते |  १७   क
समीक्षस्व पुनर्वुद्ध्या हर्षं त्यक्त्वा द्विजोत्तम |  १७   ख
अय़ज्ञवाहिनं पापमकार्षीस्त्वं सुदुर्मते ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति